Thursday, 12 September 2019

who is khatu shyam ji ? खाटू श्याम कौन है, खाटू श्यामजी की पूरी कहानी

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 हेलो दोस्तो कैसे हो आप सब दोस्तो आज मैं आया हु आप लोगो के पास एक ऐसे महान हस्ती के बारे मे जो आज खाटू नरेश के नाम से भी जाने जाते है।


राजस्थान के सीकर जिले मैं श्री खाटू श्याम जी का सुप्रसिद्ध मंदिर है, वैसे तो खाटू श्याम बाबा के भगतो की कोई गिनती नही है, लेकीन इनमे खासकर - ब्राह्मण, वैश्य, ओर मारवाडी जैसे व्यवसायी वर्ग अधिक संख्या मे है। श्याम बाबा कौन थे, उनके जन्म और जीवन चरित्र के बारे मे हम जानेंगे , ज्यादा समय ना लेते हुए शुरू करते है-  





 खाटू श्याम जी का असली नाम बरबरीक है। महाभारत की एक कहानी के अनुसार बरबरीक का सिर राजस्थान के खाटू नगर मैं दफना दिया था, इसीलिए बरबरीक जी का नाम खाटू श्याम बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ । वर्तमान मे खाटू नगर सीकर जिले मे है, खाटू श्याम बाबा जी कलयुग मैं श्री कृष्ण भगवान के अवतार के रूप मे माने जाते है। 

 श्याम बाबा  (घटोत्कच और नागकन्या मोरवी के पुत्र है, ) पांचो पांडवो मैं सबसे बलशाली "भीम" ओर उनकी पत्नी "हिडिम्बा" ( बरबरीक के दादा और दादी )  थे।   कहते है कि जन्म के समय बरबरीक ( बाबा श्याम ) के बाल बब्बर शेर के समान थे, अतः उनका नाम बरबरीक रखा गया, बरबरीक का नाम  "श्याम बाबा"  कैसे पड़ा आइये जानते है:-            




                            बरबरीक बचपन मे एक वीर और तेजस्वी बालक थे, बरबरीक ने भगवान श्री कृष्ण और अपनी माँ मोरवी से युद्धकला, कौशल सिख कर निपुणता हासिल करली थी।    बरबरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी, जिसके आषीर्वादशवरूप भगवान शिव ने बरबरीक को तीन चमत्कारी बाण दिए, इसी कारण "बरबरीक" का नाम तीन बाणधारी के नाम से  भी प्रसिद्ध है, भगवान अग्निदेव ने बरबरीक को एक दिव्य धनुष दिया, जिससे वो तीनो लोको पर विजय प्राप्त करने मे समर्थ थे।        



        जब कौरवो--पांडवो का युद्ध होने की सूचना बरबरीक को मिली तो उन्होंने भी युद्ध मे भाग लेने का निर्णय लिया, बरबरीक ने अपनी माँ का आशीर्वाद लिया उनकी माँ ने कहा हारे हुये पक्ष का साथ देना, बरबरीक ने वचन दिया और निकल पड़े. इसी वचन के कारण हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा यह बात प्रसिद्ध हुई।  



 जब बरबरीक जा रहे थे तो उन्हें मार्ग मैं एक ब्राह्मण मिला , यह ब्राह्मण कोई और नही , भगवान श्री कृष्ण थे, जोकि बरबरीक की परीक्षा लेने चहाते थे, ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बरबरीक से प्रसन्न किआ ओर कहा कि वो मात्र तीन बाण लेकर लड़ने को जा रहा है, मात्र तीन बाण से कैसे कोई युद्ध लड़ सकता है। बरबरीक ने कहा कि उनका एक ही बाण शत्रु सेना को समाप्त करने मे सक्षम है और इसके बाद भी वह तीर नष्ट न होकर वापस उनके तरकश मैं आ जायेगा, अतः अगर तीनो तीर के उपयोग से तो सम्पूर्ण जगत का विनाश किआ जा सकता है।  ब्राह्मण(श्रीकृष्ण) ने बरबरीक से एक पीपल के व्रक्ष की ओर इशारा करके कहा कि वो एक बाण से पेड़ के सारे पत्तो को भेदकर दिखाए, 



बरबरीक ने  भगवान का ध्यान कर एक बाण छोड़ दिया, उस बाण ने पीपल के सारे पत्तो को भेद दिया और उसके बाद बाण ब्राह्मण बने श्रीकृष्ण के पैरों के चारो तरफ घूमने लगा असल मे श्रीकृष्ण ने एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा लिया था, बरबरीक समझ गए कि तीर उसी पत्ते को भेदने के लिए ब्राह्णण के पेर के चक्कर लगा रहा है बरबरीक बोले -- हे ब्राह्मण अपना पैर हटा लो , नही तो ये आपके पेर को भेद देगा। 



श्रीकृष्ण बरबरीक के पराक्रम से प्रसन्न हुए, उन्हीने पूछा कि बरबरीक किस पक्ष की तरफ से युद्ध करोगे, बरबरीक बोले कि उन्होने लड़ने के लिए कोई पक्ष  नही चुना है, वो तो अपने वचन अनुसार हारे हुए पक्ष की ओर से लड़ेंगे, श्रीकृष्ण ये सुनकर विचारमग्न हो गए क्योकि बरबरीक के इस वचन के बारे में कौरव जानते थे।   कौरवो ने योजना बनाई थी कि युद्ध के पहले दिन वो कम सेना के साथ युद्ध करेंगे, इससे कौरव युद्ध मे हारने लगेंगे, जिसके कारण बरबरीक कौरवो की तरफ से लड़ने आ जाएंगे, अगर बरबरीक कौरवो की तरफ सर लड़ेंगे तो उनके चमत्कारी बाण पांडवो का नाश कर देंगे।  



कौरवो की योजना विफल करने के लिए ब्राह्णण बने श्रीकृष्ण ने बरबरीक से एक दान देने का वचन मंगा, बरबरीक ने दान देने का वचन दे दिया। अब ब्राह्णण ने बरबरीक से कहा की उसे दान मैं बरबरीक का सिर चाहिए।  इस अनोखे दान की मांग सुनकर बरबरीक हैरान हो गए और समझ गए कि यह ब्राह्मण कोई समान्य व्यक्ति नही है,  बरबरीक ने प्राथना की वो दिए गए वचन अनुसार अपने शीश का दान जरूर करेंगे, लेकिन पहले ब्राह्मणदेव वास्तविक रूप मे प्रकट हों। भगवान श्रीकृष्ण अपने असली रूप मे प्रकट हुए, बरबरीक बोलेबकी है देव मैं अपना शीश देने के लिए वचंबन्द हूँ लेकिन मे ये युद्ध अपनी आँखों से देखने की इच्छा है, 

 

श्रीकृष्ण  ने बरबरीक की वचंबन्दता से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा पूरी करने का आशीर्वाद दिया, बरबरीक ने अपना शीश काटकर श्रीकृष्ण की दे दिया।  श्रीकृष्ण ने बरबरीक के सिर को 14 देवियों के द्वारा अमृत से सींचकर युद्धभूमि के पास एक पहाड़ी पर सिथित कर दिया, जहाँ से बरबरीक युद्ध का दृश्य देख सके, इसके बाद श्रीकृष्ण ने बरबरीक के धड़ का शास्त्र विधि से अंतिम संस्कार कर दिया।  



 महाभारत का महान युद्ध समाप्त हुआ और पांडव विजयी हुए, विजय के बाद पांडवों मैं यह बहस होने लगी कि इस विजय का श्रेय किस योद्धा को जाता है,  

श्रीकृष्ण ने कहा --- चूंकि बरबरीक इस युद्ध के साक्षी रहे हौ, अतः इस प्रस्न का उत्तर उन्ही से जानना चाहिए। तब परमवीर बरबरीक ने कहा कि इस युद्ध की विजय का श्रेय एकमात्र श्रीकृष्ण को जाता है, क्योंकि यह सब कुछ श्रीकृष्ण की उत्कृष्ट युद्धनीति के कारण संभव हुआ, विजय के पीछे सबकुछ श्री कृष्ण की ही माया थी।    



 बरबरीक के इस सत्य वचन से देवताओं ने बरबरीक पर पुष्पों की वर्षा की ओर उनके गुणगान गाने लगे श्रीकृष्ण वीर बरबरीक की महानता से अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा -- हे वीर बरबरीक आप महान हैं, मेरे आशीर्वाद स्वरूप आज से आप मेरे नाम श्याम से प्रसिद्ध होंगे, कलयुग मैं आप कृष्णवतार रूप मे पूजे जाएंगे और अपने भगतों के मनोरथ पूर्ण करेंगे। 



 भगवान श्रीकृष्ण का वचन सिद्ध हुआ और आज हम देखते भी हैं कि भगवान श्री खाटू श्याम बाबा अपने भगतो पर निरंतर अपनी कृप्या बनाये रखते हैं।  इसीलिए जो सारी दुनिया से हारा सताया गया होता है वो भी अगर सच्चे मन से बाबा श्याम का समरण करे तो उसका कल्याण अवश्य ही होता है, श्री खाटू श्याम बाबा की महिमा अपरंपार है,  एक बार तो अवश्य बाबा के चरणों मे माथा टेक के आये सबका कल्याण हो।   



तो दोस्तो ज्यादा से ज्यादा शेयर करे  ताकि आपके दोस्तों और रिलेटिव्स को भी पता चले कि बाबा श्याम की महिमा का।

                            । धन्यवाद ।


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